
गीतकार
मज़रूह सुल्तानपुरी
1919–2000
मज़रूह सुल्तानपुरी (1919–2000) हिंदी सिनेमा और उर्दू अदब के महान गीतकार और शायर थे। उन्होंने अपनी क्रांतिकारी शायरी और रूमानी गीतों से भारतीय संस्कृति और संगीत जगत को समृद्ध किया।
26 अनमोल विचार · पूरी सूची →
मज़रूह सुल्तानपुरी का जन्म 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ था। उनका मूल नाम अस्रार हसन खान था और उन्होंने दर्स-ए-निजामी की पारंपरिक तालीम हासिल की थी। वे प्रगतिशील लेखक संघ के सक्रिय सदस्य रहे और मजदूर आंदोलन के समर्थन में जेल भी गए। उन्होंने अपने पांच दशक से अधिक लंबे फिल्मी सफर में चार हजार से अधिक गीत लिखे। वर्ष 1993 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा गया।
मज़रूह सुल्तानपुरी के अनमोल विचार
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।
लोग साथ आते गए और कारवां बनता गया।
चाहा था हमने तो ये कि बस जाए इक जहाँ
इस शहर-ए-बेमिसाल में क्या क्या उजड़ गया।
इस शहर-ए-बेमिसाल में क्या क्या उजड़ गया।
हर इक मक़ाम से आगे निकल गए हम भी
तलाश-ए-दोस्त में क्या क्या सफर किए हमने।
तलाश-ए-दोस्त में क्या क्या सफर किए हमने।
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वो जो मिलते हैं कभी राह में अजनबी बनकर
उम्र भर उनकी मोहब्बत का असर रहता है।
उम्र भर उनकी मोहब्बत का असर रहता है।
इस दौर के इंसानों से क्या शिकवा करें मज़रूह
परछाइयों ने भी अब साथ छोड़ दिया है।
परछाइयों ने भी अब साथ छोड़ दिया है।
रात भर चांद की किरणों से बातें की हमने
तन्हाई के सफर में कोई तो हमसफर मिला।
तन्हाई के सफर में कोई तो हमसफर मिला।
हर एक सांस में बसी है तुम्हारी यादें
कोई भला दिल से तुम्हें कैसे भुला सकता है।
कोई भला दिल से तुम्हें कैसे भुला सकता है।
सर फ़िरोशों ने सँभाली है बगावत की कमान, और अब ज़ुल्म के हाथों में शिकस्त आई है।
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बुझ गया दिल का दिया शाम-ए-अलम होने पर, कौन कहता है कि बहते नहीं आँसू दिल में।
गर्दिश-ए-दौर का हर ज़ख्म उठाया हमने, फिर भी इस दौर के इंसानों से गिला क्या कीजिए।
ऐ शोख़-ए-नज़र हम से न आ आँखें चुराओ, जो बात है वो साफ़ ज़ुबाँ पर भी लाओ।
दोस्ती का ये सिला हमने दिया है खुद को, हर शिकस्ता दिल को सीने से लगाया हमने।
वक़्त के साथ बदल जाते हैं चेहरों के रंग, आईने से भी नज़र फेर ली जाती है यहाँ।
सच की राहों पे जो काँटे भी बिछाए किसी ने, हमने हर ज़ख्म को फूलों की तरह पाला है।
आदमीयत का तकाज़ा है यही ऐ नादाँ, दर्द में जो साथ न दे वो भी पराया न लगे।
राह में मुश्किलें कितनी ही क्यों न आ जाएँ, हर कदम सच की तरफ़ आज बढ़ाना होगा।
प्यार के नाम पे दुनिया में जो रुस्वा हुए, हमने हर दर्द को चुपचाप गले से लगाया।
उम्र भर ढूँढते रहे अपनी ही मंज़िल को हम, खुद से आगे न कोई राह का साथी निकला।