होम › लेखक कोश › कार्ल मार्क्सदार्शनिक कार्ल मार्क्स 1818–1883
कार्ल मार्क्स (1818–1883) एक महान जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री और समाज सुधारक थे। उन्होंने 'दास कैपिटल' और 'कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो' के माध्यम से दुनिया को पूंजीवाद की आलोचना और ऐतिहासिक भौतिकवाद का नया सिद्धांत दिया। उनके विचारों ने वैश्विक स्तर पर श्रमिक आंदोलनों और समाजवादी क्रांतियों की नींव रखी।
कार्ल मार्क्स का जन्म 5 मई 1818 को जर्मनी के ट्रियर शहर में हुआ था। उन्होंने बॉन और बर्लिन विश्वविद्यालयों में कानून और दर्शनशास्त्र की पढ़ाई की। उनका मुख्य योगदान पूंजीवादी व्यवस्था का विश्लेषण और 'वैज्ञानिक समाजवाद' का प्रतिपादन था। उनके अनुसार, समाज का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। उनके विचार आज भी समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीतिक दर्शन में अत्यंत प्रभावशाली हैं। उनका निधन 14 मार्च 1883 को लंदन में हुआ था।
कार्ल मार्क्स के अनमोल विचार दार्शनिकों ने केवल दुनिया की अलग-अलग तरीकों से व्याख्या की है, असली बात तो उसे बदलना है।
धर्म जनता के लिए अफीम की तरह है।
मनुष्य अपने इतिहास का निर्माण स्वयं करता है, लेकिन वह इसे अपनी इच्छा से नहीं करता।
इतिहास खुद को दोहराता है—पहली बार एक त्रासदी के रूप में, और दूसरी बार एक प्रहसन के रूप में।
पूंजीवाद अपनी कब्र खुद खोदता है।
अब तक के सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है।
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उत्पादन के साधन जितने अधिक शक्तिशाली होंगे, श्रमिक वर्ग का शोषण उतना ही गहरा होगा।
विचार कभी भी वास्तविकता से अलग अस्तित्व नहीं रखते, वे सामाजिक परिस्थितियों की उपज हैं।
संसार के मजदूरों, एक हो जाओ! तुम्हारे पास खोने के लिए केवल तुम्हारी बेड़ियाँ हैं।
राज्य शासक वर्ग के सामान्य मामलों का प्रबंधन करने वाली एक समिति मात्र है।
सामाजिक प्रगति का आकलन हमेशा महिलाओं की सामाजिक स्थिति से किया जा सकता है।
मनुष्य की चेतना उसके अस्तित्व को निर्धारित नहीं करती, बल्कि उसका सामाजिक अस्तित्व उसकी चेतना को निर्धारित करता है।
हर किसी से उसकी क्षमता के अनुसार, और हर किसी को उसकी आवश्यकता के अनुसार मिले।
उत्पादन के साधनों पर सामाजिक नियंत्रण ही मानव स्वतंत्रता की वास्तविक शुरुआत है।
कामगारों के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवाय कुछ नहीं है, और पाने के लिए पूरी दुनिया है।
समाज की भौतिक परिस्थितियों से ही मनुष्य की चेतना निर्धारित होती है, न कि उसकी चेतना से समाज।
हर समाज के शासक वर्ग के विचार ही हर युग में प्रमुख और शासी विचार होते हैं।
धर्म पीड़ित प्राणी की आह है, हृदयहीन दुनिया का हृदय है, और वह आत्माहीन परिस्थितियों की आत्मा है।
जिस अनुपात में पूंजी बढ़ती है, उसी अनुपात में श्रमिक वर्ग की पीड़ा और अलगाव भी बढ़ता जाता है।
इतिहास में महान घटनाएं और पात्र अक्सर दो बार आते हैं—एक बार त्रासदी के रूप में और दूसरी बार प्रहसन के रूप में।
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मनुष्य अपनी परंपराओं का बोझ अपने दिमाग पर ढोता है, जो भूतकाल के साये की तरह वर्तमान पर हावी रहता है।
आधुनिक बुर्जुआ समाज, जिसने उत्पादन के इतने विशाल साधन खड़े किए हैं, उस जादूगर जैसा है जो अपनी शक्तियों को नियंत्रित नहीं कर पाता।
बौद्धिक स्वतंत्रता का सच्चा अर्थ तभी संभव है जब मनुष्य आर्थिक तंगी और भुखमरी की गुलामी से पूरी तरह मुक्त हो जाए।
एक समाज की प्रगति का सही पैमाना महिलाओं की सामाजिक स्थिति और स्वतंत्रता के स्तर से मापा जाता है।
उत्पादन के साधनों पर कब्जा रखने वाला समाज का हर क्षेत्र नियंत्रित करता है।
संस्कृति, नैतिकता और कानून हर युग में शासक वर्ग के ही हित साधते हैं।
एक अकेली मज़दूर की जान और उसकी आज़ादी पूंजी के बाज़ार में बिकने वाली वस्तु बन जाती है।
कामगारों की अपनी कोई ज़मीन नहीं होती, इसलिए उनका देश भी नहीं होता।
जब तक समाज वर्गों में बंटा रहेगा, तब तक न्याय और आज़ादी महज एक छलावा रहेंगे।
हर वस्तु का मूल्य उस पर लगे मानवीय श्रम के आधार पर तय होता है।
आधुनिक उद्योग मज़दूरों को सिर्फ एक मशीन का जीवंत पुर्जा बनाकर छोड़ देते हैं।
पूँजी मृत श्रम है, जो पिशाच की तरह केवल जीवित श्रम चूसकर ही जीवित रहती है।
क्रांति में मज़दूरों के पास अपनी बेड़ियों के सिवा खोने के लिए कुछ नहीं है।
विचार कभी भी समाज की भौतिक परिस्थितियों से अलग होकर स्वतंत्र रूप से नहीं पनपते।
आर्थिक ढांचा ही समाज की राजनीति, धर्म और संस्कृति की नींव तय करता है।
निजी संपत्ति का अंत ही इंसान को उसकी खोई हुई मानवीय गरिमा वापस दिला सकता है।
समाज में हर व्यक्ति की क्षमता के अनुसार काम और उसकी ज़रूरत के अनुसार दाम मिलना चाहिए।
शासक वर्ग के विचार ही हर युग में समाज के सबसे प्रभावी और सर्वमान्य विचार होते हैं।
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